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सोमवार, 9 अप्रैल 2018

चिट्ठी


कुछ बरस ही बीते होंगे
चिट्ठी का औचित्य ख़तम हुए
पर वह संवेदना और भावना
आज कहाँ है इन यस-यम-यस
और ई-मेल में
कहाँ है इसमें मन का प्यार
चहुँ ओर है केवल व्यभिचार
कहाँ है इसमें मन की बातें
यहाँ तो है केवल लोकाचार
यादों को कुरेद कर
छोटे से टुकड़े पर
जब मन की अस्थिरता
स्याही के माध्यम से
ढलकती है उन कागज पर
तब ना जाने कितने मीलों को पार कर
यह पहुचती है अपने प्रियतम के पास
तब सब्र की इंतिहा भी
टूट जाया करती है
और उसे छूने और पढने
की ललक लिए आपोआप
कर बढ़ते चले जाते है
अपने यादों को सहेजकर
और अतीत से नाता जोड़कर
उस भीनी भीनी सुगंध
को महसूस कर
रोम-रोम में प्रेम-रस  
और नैन पलट में शबनम
प्रस्फुटित होता है
काश फिर वही चलन चल जाये
चिट्ठियां आये और जाये
शायद ऐसा मुमकिन न हो
यह सोचकर मन कुंठित होता है

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

कफ़न के लिए

मिट्टी से जन्मा, मिट्टी में खेला
मानव का तन सृजन के लिए
मिट्टी ही पहली बनी आधार
इस मानव के बचपन के लिए
नन्हे क़दमों ने जोर लगाया
गया मदरसा अध्ययन के लिए
हुई पढाई पूरी अब तो
योग्य हुआ चिंतन मनन के लिए
एक दिन सोचा मै भी बनाऊं
एक आशियाना रहन सहन के लिए
मिट्टी का ही बना घरौंदा
हुआ तैयार अब “लगन” के लिए
नया हमसफ़र आया उसका
खुश थे दोनों नए जीवन के लिए
जीवन की नैया डोल रही थी |
कुछ आगे बढते बोल रही थी ||
क्यों मानव के दिल औ दिमाग में
क्या यही है सब कुछ चमन के लिए
ये प्रेम नहीं है, है यह वासना
मिलन है यह तो दो बदन के लिए
प्रगाढ़ प्रेम जब बढ जाता है
तब बचता नहीं कुछ हनन के लिए
चेत ले मानव अब भी समय है
कुछ समय शेष है तेरे गमन के लिए
नास्तिक छोड़ आस्तिक बन जा अब
कुछ ध्यान लगा प्रभु भजन के लिए
वरना यह मिट्टी फिर मिट्टी बनकर
सड़ती रहेगी एक कफ़न के लिए

बुधवार, 19 जुलाई 2017

सूखा सावन



अंखिया एकटक राह निहारे, बेर हुई है मोरे साजन
बिरहिन बरखा जिया जरावे हमका लागे सूखा सावन
नित रैना में करवट फेरूँ, दिवस भये अब मासा
राह तकत है सूने नैना छाई है घोर निराशा
बलम घर छोडि बिदेश बसे है दरद न समझे मन की
सेजिया भई रे कारी नगिनिया अहक मिटे न मोरे तन की
केसी कहें हम मन की बतिया, रतिया भइल पहाड़
जुल्मी बदरिया चम चम चमके, बेधत करेजवा में बाण
कब ले सम्भारी कैसे उतारी भईल जोबन अब बोझ
देहिया पे नेहिया के नशा चढल बा, टप टप टपकेला रोज
अब तो सुधि लो मोर बलम जी बीता जाये सावन
पूरा करदा मोर अरमनवा बिनती करी मनभावन

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

हया

आज इस मुल्क और शहर को हुआ क्या है

सोचता हूँ की बाकी अब बचा क्या है
खुलेपन और सौंदर्य की चाह में
भूले, मान-मर्यादा और हया क्या है
राहें पतन की जब उन्होंने चुनी
वो बोले की इसमें नया क्या है
भेष बदले है अपने ही लोगों ने
अब पहचान खोने में बचा क्या है
क्या अब फिर से लौटेंगे वो खुशहालियां
उस सुन्दर चमन का पता क्या है

आज इस मुल्क और शहर को हुआ क्या है
सोचता हूँ की बाकी अब बचा क्या है
खुलेपन और सौंदर्य की चाह में
भूले, मान-मर्यादा और हया क्या है
राहें पतन की जब उन्होंने चुनी
वो बोले की इसमें नया क्या है
भेष बदले है अपने ही लोगों ने
अब पहचान खोने में बचा क्या है
क्या अब फिर से लौटेंगे वो खुशहालियां
उस सुन्दर चमन का पता क्या है - See more at: http://www.internationalnewsandviews.com/poetryoninvcnews/#sthash.r3pNquDD.dpuf
आज इस मुल्क और शहर को हुआ क्या है
सोचता हूँ की बाकी अब बचा क्या है
खुलेपन और सौंदर्य की चाह में
भूले, मान-मर्यादा और हया क्या है
राहें पतन की जब उन्होंने चुनी
वो बोले की इसमें नया क्या है
भेष बदले है अपने ही लोगों ने
अब पहचान खोने में बचा क्या है
क्या अब फिर से लौटेंगे वो खुशहालियां
उस सुन्दर चमन का पता क्या है - See more at: http://www.internationalnewsandviews.com/poetryoninvcnews/#sthash.r3pNquDD.dpuf

गुरुवार, 26 मार्च 2015

दिखाओ न ख्वाब फिर से सुनहरे



दिखाओ न ख्वाब फिर से सुनहरे
वरना हो जायेंगे जख्म फिर से हरे
वफ़ा और बेवफा तो दस्तूर है
फरक क्या है उसको जो प्रेम में चूर है
सिला क्या दिया तूने मेरे प्यार का
जो हो गया तेरा छोड़ संसार का
घोंटा गला मेरे अरमानो का
दबा हु तले तेरे एहसानों का
लोगो ने पूछा कि क्या हो गया है
मेरा यार मुझसे जुदा हो गया है
अब कौन सा रंग अपने जीवन में भरे
जब मेरा रंग ही मन को बदरंग करे

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

आज कुछ मन उदास है

आज कुछ मन उदास है 
उसके जाने का अहसास है 
मन में हजारों अरमानों का 
गुबार लिए बैठा हूँ 
कब निकलेंगे दिल से 
ये आस लगाये बैठा हूँ 
आज का दिन कुछ खास है
आज कुछ मन उदास है 
जो न कही आज तक
वो कहानी तुम हो 
बीते लम्हों की मीठी
यादों की रवानी तुम हो 
आज जो भी हूँ मैं
उसकी वजह एक खास है 
आज कुछ मन उदास है 
दुनियां में कुछ चीजें ऐसी होती है 
वजूद उनकी सपनों के जैसे होती है 
नींद में हो तो सब कुछ तुम्हारा है 
टूटे ख्वाब तो लुटा हुआ जहाँ सारा है 
तुझे पा न सका तो क्या हुआ 
तेरा सच्चा प्यार मेरे पास है 
आज कुछ मन उदास है

 

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

फिर भी क्यों अनजान है हम

इस रंग बदलती दुनियां से परेशान है हम, अनजान है हम
समय का पहिया रुकता नहीं है फिर भी क्यों अनजान है हम
आया है याद वो फिर से अपना, बीत चूका है जो है सपना
बीता लड़कपन आई जवानी, कैसे कह दें की वो था अपना
भीड़-भाड़ की इस दुनियां में आज कितने बे जान है हम 
यारों के संग धूम मचाना, गलियों में था आना जाना 
खेतों में की वह हरियाली, चिड़ियों का था चह- चहाना 
मानव की कु- बोली से आज कितने नादान है हम
नदी का किनारा और साँझ की लालिमा लिए हुए 
कल-कल करता बहता पानी, पूरी मस्ती लिए हुए 
आज कहता है की सारे बीमारी की पहचान है हम 
आज जो हो वो पहले ना था, ऐसे बयार है चली 
भौतिक सुख के लोभ में आकर, आज की पीढ़ी कहाँ चली 
ऐसी करनी से राम बचाए इंसान नहीं हैवान है हम


शुक्रवार, 9 मार्च 2012

कितने रंग भरे है

होली में कितने रंग भरे है
ये हमारी समझ से कितने परे है
साल के बारह महीने
बारह के बावन
तब जाकर आता है
यह मास बड़ा ही पावन
फिर भी हम अपनी
रोजमर्रा की जिम्मेदारी में
कैसे उलझे हुए है
पाप, भ्रस्टाचार और चापलूसी
में कितने सुलझे हुए है
होली का त्यौहार तो आता ही है
हर साल हमे यह सिखाता ही है
ये इंसान तुझमे तो मुझसे भी
ज्यादा रंग भरा है
कोई क्या दीगायेगा तुझे गर
तेरा ईमान खरा है
सब बुरे कर्म छोड़कर अच्छाई अपना लो
अपने रंग में रंग कर जीवन सफल बना लो

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

उनके तस्वीर को अपने सीने से लगाये बैठे है

उनके आने की ख़ुशी में एक आस लगाये बैठे है
उनके तस्वीर को अपने सीने  से लगाये बैठे  है
ना वो आये न उनकी कोई भनक लगी
मिलने की चाहत एक कसक सी लगी
अपने जज्बात को यूँ ही
सीने में दबाये बैठे है
उनके तस्वीर को अपने
सीने से लगाये बैठे  है
अब तो आलम ये है कि नींद भी नहीं आती है
क्या करे अपनी फूटी तक़दीर नजर आती है
गिला औरों से क्या जब अपनों से ही खता खाए बैठे है
उनके तस्वीर को अपने
सीने से लगाये बैठे  है
खता हमारी थी जो हमने उनसे प्यार किया
बुरा किया जो हसीनाओं पे ऐतबार किया
बेवफा दुनियां में अपना सब कुछ लुटा बैठे है
उनके तस्वीर को अपने
सीने से लगाये बैठे  है

शनिवार, 19 नवंबर 2011

याद जब तेरी आती है तो आँखे नम हो जाती है

याद जब तेरी आती है तो आँखे नम हो जाती है
ढूढती है हर तरफ मगर दीदार नहीं कर पाती है
यादों के सहारे तो जिंदगी का सफ़र कटता नहीं
क्या करे ये दिल में जो दर्द है वो मिटता नहीं
चकाचौंध भरी दुनिया में रूह शुकून नहीं पाती हैं
याद जब तेरी आती है तो आँखे नम हो जाती है
वक्त के मरहम ने हर जख्म को भर दिया है
एक आम को बनाकर एक खास कर दिया है
सोना है गहरी नींद में पर रात कम हो जाती है
याद जब तेरी आती है तो आँखे नम हो जाती है
अब तो फ़साना बन गया है बस यादें ही बाकी है
डूबती हुई नैया को तिनके का सहारा काफी है
उजड़े हुए चमन में सावन का आना बाकी है
याद जब तेरी आती है तो आँखे नम हो जाती है

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

वो दिन आप को याद कैसे दिलाये

वो दिन आप को याद कैसे दिलाये
घर से निकलना और कुछ दूर जाना
तेरा फिर चुपके से पीछे से आना
पेड़ों के झुरमुट में बैठते थे हम तुम
सारे के सारे दुःख अपने हो जाते थे गुम
यही वो जगह है जहाँ हम मिले थे
यही वो जगह हैं, यही वो फिजायें
तुमने कहा था गले से मुझको लगाकर
सदा के लिए हम एक हो गए है
कहा था मेरा हाथ हाथों में लेकर
जुदा हम हुए तो करेंगे क्या जीकर
इन्हें हम भला, किस तरह भूल जाए
यही वो जगह हैं, यही वो फिजायें

बुधवार, 9 नवंबर 2011

हम भी प्यार के दीवाने है

एक कसक जो दिल के आगोश में सिसक रही थी
कह न पाए उनसे की हम भी प्यार के दीवाने है
एक मुद्दत से चाहा था जिनको हमसफ़र के लिए
आज वो कहते है की झूठे ये सब अफसाने है
लोग कहते है की प्यार तो खुद अपने में अधुरा है
ये तो हसीनाओं के खेलने के एक बहाने है
वे क्या समझेंगे प्यार का क्या मतलब होता है
इसको तो जानने में ही लगे कितने ज़माने है
दिल तोडना और खेलना तो कोई उनसे सीखे
जो कहते है की अभी और भी आशिक बनाने है
मेरी आशिकी का क्या सिला दिया है उन्होंने
ये तो बस अब सारे आशिकों को बताने है

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

इस दिवाली पर क्या लिखूं

कुछ दिन से मै सोच रहा हूँ
इस दिवाली पर क्या लिखूं i
महगाईं की मार लिखूं या
लोग पोछते पसीने की बुँदे
खड़े राशन की कतार लिखूं ii
भ्रस्टाचार या ब्यभिचार लिखूं
मानव बन गया है दानव
रावण का अवतार लिखूं ii
बच्चो का बिलखना और रोना
क्या भूखे पेट का सवाल लिखूं
फटे आँचल में से झाकती
माँ की आबरू का हाल लिखूं
दो - दो दिन बिन पानी के कैसे
गुजरे है वो सुबह शाम लिखूं
राजनीती की गन्दी सोच में
होते है जो वो काम लिखूं
नेता आये, आकर चले गए
वादे करके मुकर गए
फिर भी वोट तो उनका ही है
क्या जनता का व्यवहार लिखूं
बैठ सियासत की कुर्सी पर
मनमानी उनकी बढती गयी
जेब भरी और घर भर दिए
भरा उनका दरबार लिखूं
इतना होने पर भी अपना
भारत देश हमारा है
खुली आखो से देख तमाशा
अपना भारत देश महान लिखूं





सब कही न कही साथ छोड़ जाते है

किसी की दास्ताँ को लफ़्ज़ों में बयां करते है,
न जाने उन पर अब क्या सितम गुज़रते  है !
ख़ुशी के आंसू  भी एक ग़म की तरह होते है,
हर दिल में इक दर्द के जो कारण बनते है,
इक शायर की कलम दर्द की जुबान होती है,
हर लफ्ज़ को पिरोकर ग़ज़ल का रूप करते है,
न जाने हम क्यों लिखने पे मजबूर हो जाते है,
जब यही दर्द हद से गुज़र जाया करते है
ये मंजिल सबको किसी न किसी का दर्द सुनाती है,
ये आंसू ही तो है जो अनायास ही आँखों से छलक जाते है,
मानो ये कहानी अब हम सब पे लागू होती है,
मंजिल के सफ़र में सब कही न कही साथ छोड़ जाते है,